मंगलवार, 4 सितंबर 2018

कविता

कविता

संबंधहीनता

देह के ऊपर एक और देह
कभी हलचल,
कभी शांत पड़ी रहती है पूरी रात दोनों.
वर्षों से चलता आ रहा है यह सिलसिला
प्रेम के नाम पर.
कितना जानते हैं दोनों
एक-दूसरे को?
सिर्फ देह को या,
मन को भी?
क्या जानते भी हैं?
कहना कठिन है.
संबंधहीनता की परकाष्ठा
क्या नहीं है यह?

- तरु श्रीवास्तव

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