शनिवार, 4 नवंबर 2017

एक बार फिर

एक बार फिर
एक बार फिर
उमर रहा है वात्सल्य
अजन्मा के प्रति
जिसे देखा तक नहीं।
पहले भी कई बार
गर्भ ने आकार लिया है
बिना देखे ही उससे
घंटों बातें की है मैंने।
हाथ-पांव हिलाते हुए,
किलकारियां भरते हुए
अपनी ही रचना को साक्षात देखने का स्वप्न
किंतु,
अभी भी अधूरा है।
हर बार ही विवश कर दी जाती हूं
अपने ही सामने
अपने सृजन को मिटते
देखती रह जाती हूं।
हर बार ही शोक मिटने से पहले
थोप दी जाती है
एक नई कोख।
पुत्र जन्म की खुशियां
फिर से मननी शुरू हो जाती है।
एक बार फिर से
उमर आता है वात्सल्य
अजन्मा के प्रति
जिसे देखा तक नहीं।
- तरु श्रीवास्तव

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