गुरुवार, 2 नवंबर 2017

मृत्यु के पश्चात
पत्नी की मृत्यु के पश्चात
बड़े लाड़-प्यार से
पाल-पोसकर बड़ा किया था अपनी बिटिया को
आज अकेले ही कर रहे थे सारे नेग-चार
उसके ब्याह के
पत्नी की छायाचित्र के साथ।
किसी ने भी विधुर होने के कारण
नहीं माना था उन्हें अशुभ
शुभ कार्यों के लिए त्याज्य।
कुल डेढ़ बरस ही तो हुए थे
अर्धांगिनी को आये हुए
जब छह महीने की बिटिया को छोड़ वो गयी थी
स्वर्ग सिधार।
तब बिना विचलित हुए ही कर डाला था एक प्रण
नहीं करूंगा दूसरा विवाह
एकाकी ही बिता दूंगा संपूर्ण जीवन
कर डालूंगा अपनी सारी इच्छाओं का बलिदान।
और पत्नी की स्मृति के सहारे ही
काटा लिया पूरा जीवन
सबने दिया उन्हें देवता तुल्य सम्मान।
क्या एक जननी को भी मिल सकता है इतना सम्मान
बेटी को अकेली पाल-पोसकर बड़ा करने के लिए?
क्या उसे भी माना जा सकता है इतना शुभ
कि वह भी कर सके सारे नेग-चार
उसके ब्याह के
अपने पति के छायाचित्र के साथ
उसकी मृत्यु के पश्चात?
-तरु श्रीवास्तव

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