रविवार, 11 फ़रवरी 2018

बिरहन की पीड़ा
बिरहन की रामा, दोनों नैना
नीर भरे या पीड़ भरे।
उखड़ी-उखड़ी सांसों में हर पल
पी से मिलन की आस पले।
बिरहन की रामा ----       ।

कल ना पड़े तड़पे दिन-रैना
पिंजरबद्ध खग तड़पे जैसे।
बन जोगन भटके वन-उपवन
ढ़ूंढ़े प्रभु, मीरा जैसे।
बिरहन की रामा----       ।

कैसे कहूं मैं प्रीत है तुझसे
बहुत फरक है तुझमें, मुझमें।
कह दूं जग जीने ना देगा
बोले बिना तुम जानोगे कैसे।
बिरहन की रामा----        ।

ना जाने कहां छुप से गये हो
कैसे मिलेंगे हम तुमसे।
मिल जाओ तो कह दें मन की
कह ना सके पहले तुमसे।
बिरहन की रामा----       ।

बिरहन की रामा, दोनों नैना
नीर भरे या पीड़ भरे।
उखड़ी-उखड़ी सांसों में हर पल
पी से मिलन की आस पले।

- तरु श्रीवास्तव

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