मंगलवार, 17 अप्रैल 2018

खुशी की तलाश
न रुपये में, न पैसे में,
न सुविधाओं भरे जीवन में,
बच्चों की हंसी, अपनों के संग
हम खुशियां तलाशते हैंं
दुनिया हमें न जाने क्यों,
पागल समझती है.
- तरु श्रीवास्तव

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