सोमवार, 9 अप्रैल 2018

चेष्टा
तुमने उतार लिये जाले कमरों के,
मेज-कुर्सियों की पोंछ दी धूल,
चमका लिया रसोई, बर्तन-बासन,
पर, क्या एक बार भी झांककर देखा
अपने मन के भीतर,
चेष्टा की, वहां जमी धूल हटाने की.
- तरु श्रीवास्तव

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