शनिवार, 8 सितंबर 2018

कविता

कविता

अधिकार


अब भी बचे हैं मेरे पास
थोड़े से जीवन मूल्य
किसी को गिराकर ऊपर उठना
अभी नहीं सीखा है मैंने
दूसरों के हिस्से का खाना
येन-केन-प्रकारेण,
अपनी थाली में लाना
अभी नहीं सीखा है मैंने
दूसरों के हिस्से की प्रशंसा पाने के लिए
उनकी उपलब्धियां चुराना
अभी नहीं सीखा है मैंने
यह भी तो नहीं सीखा है
कि कैसे भरे जाते हैं कान किसी के
दूसरों को नीचा दिखाने के लिए
हां, पर स्वार्थी हो गयी हूं मैं
पहले से कहीं अधिक,
संवेदनहीन भी
अब नहीं धड़कता मेरा हृदय
सर्दियों में घूम रहे नंगे-अधनंगे बच्चे के लिए
अब नहीं होती पीड़ा
सदियों से उत्पीड़ित मानवता को देखकर
अब तो भीख मांग रहे मां की छाती से लटके
दूधमुंहे बच्चे को देखकर भी
हृदय नहीं धड़कता मेरा
कई बार सोचा
भूल कर रही हूं मैं स्वार्थी होकर
परंतु, क्या उन निर्धनों,
उत्पीड़ितों के ऊपर उठ चुके अपने लोगों ने
कभी सोचा उनके बारे में
क्या कोई ठोस कदम उठाये
उन्हें सशक्त बनाने के
क्या अपने हिस्से से कुछ बांटना
सीखा उन्होंने
सीखा तो केवल बांटकर राज करना
सुख-सुविधाओं में लिप्त रहना
कानों में रुई डाल
संवेदनहीन बने रहना
हमें भी तो अधिकार है
अपने लिए जीने का
स्वयं में मगन रहने का
मैं स्वीकारती हूं
जातिवादी हो गयी हूं मैं
हां, अब सवर्णवादी हो गयी हूं मैं
पर, केवल अपने बच्चे के अधिकार के लिए.

- तरु श्रीवास्तव

मंगलवार, 4 सितंबर 2018

कविता

कविता

संबंधहीनता

देह के ऊपर एक और देह
कभी हलचल,
कभी शांत पड़ी रहती है पूरी रात दोनों.
वर्षों से चलता आ रहा है यह सिलसिला
प्रेम के नाम पर.
कितना जानते हैं दोनों
एक-दूसरे को?
सिर्फ देह को या,
मन को भी?
क्या जानते भी हैं?
कहना कठिन है.
संबंधहीनता की परकाष्ठा
क्या नहीं है यह?

- तरु श्रीवास्तव

बुधवार, 29 अगस्त 2018

गीत

गीत

बन जाऊं शीला, जो कह दो अगर
शर्त है नाम उस पर तुम अपना लिखो.

कुछ  ना बाेलूंगी मैं जो ना चाहोगे तुम
भाषा नयनों की पहले मुखर तो करो.

आंधी में भी जलाये रखूंगी दिया
हौसला बन सदा संग जो मेरे रहो.

पीड़ सह जाऊंगी सारी हंसते हुए
कदम-दर-कदम संग जो मेरे चलो.

मिट जाऊंगी मैं तेरी खातिर प्रिये
धड़कनों में बस अपने समेटे रखो.

मीरा बन जाऊंगी जोग तेरा लिये
कान्हा बन मान मेरा सदा जाे रखो.

बन जाऊं शीला, जो कह दो अगर
शर्त है नाम उस पर तुम अपना लिखो.

- तरु श्रीवास्तव


मंगलवार, 14 अगस्त 2018

देशभक्ति गीत

देशभक्ति गीत

ये देश हमारा है, हमको ये प्यारा है
दुनिया से निराला है, हम सबका दुलारा है.

जहां कोयल गाती हैं, पंचम की बोली में
ऋतुएं जहां आती हैं, रागों की डोली में.

उगते सूरज को हम, जहां अर्ध्य चढ़ाते हैं
डूबते सूरज को भी, जल हम ही चढ़ाते हैं.

कई धर्म जहां जन्मे, कई धर्मगुरु जन्मे
कई भाषा जहां जन्मी, कई भाषी जहां बसते.

दुनिया में कहां किसी को, इतना मान मिलता है
घर आये अतिथि को, सम्मान मिलता है.

पावों को धोना भी जहां भाग्य समझते हैं
घर आये अतिथि को, भगवान समझते हैं.

हर वस्तु को पूजा है, सुख जिसने हमको दिया
नदियां-सागर को भी, मां-पिता है हमने कहा.

संसार को सर्वप्रथम, शिक्षा इसने दी है
जो आया शरण इसके, भिक्षा इसने दी है.

युग-युग के बंधन भी, जहां माने जाते हैं
पत्थर में ध्यान लगा, भगवान को पाते हैं.

बस एक ही इच्छा है, हर बार जनम लें हम
हर बार मिले धरती, भारत ही अंकित हो.

- तरु श्रीवास्तव


सोमवार, 6 अगस्त 2018

कविता

 अजूबा

क्या-क्या अजूबा हमने इस कलयुग में देखा है
रावण के हाथों राम को मरते देखा है.
विद्या की चंचला से कभी दोस्ती न थी
दोनों को आज हमने गले मिलते देखा है.
लहराते होंगे परचम कभी सत्य के गगन में
झूठ को ही आज हमने फलते देखा है.
जो कहते हैं हम शोषितों को न्याय देेते हैं
उनके हाथों हमने कत्ल होते देखा है.
क्या-क्या अजूबा हमने इस कलयुग में देखा है
रावण के हाथों राम को मरते देखा है.

- तरु श्रीवास्तव

शनिवार, 28 जुलाई 2018

कहानी

मुक्ति

'खुशियां आई घर-आंगन में
जब तूने मुझसे जनम लिया
निष्ठुर दुनिया के कारण ही
हाय, मैंने तुझको मुक्त किया'

बैरक में आई नई बंदी कमला, रूंधे गले से इस गीत को बार-बार दुहराती और फिर उसकी चित्कार से पूरा कारागार गूंज उठता. चित्कार के बीच ही कमला अपने दूधमुंहे पुत्र के लिए भी विलाप करती जाती.
कमला को कारागार में आए तीन से चार दिन ही हुए थे, लेकिन उसके रुदन ने बैरक की अन्य कैदियों के हृदय में उसके लिए सहानुभूति पैदा कर दी थी. किंतु किसी की भी हिम्मत नहीं हो पा रही थी कि वह कमला के दु:ख का कारण पूछ सके. इतना तो सभी बंदी समझ चुकी थीं कि कमला ने अपने बच्चे को खोया है और उसका दूधमुंहा बच्चा घर पर अकेला है. मां की ममता से भरे हृदय का इस दु:ख से द्रवित होना स्वाभाविक ही था.

अंतत: कुमुदनी हिम्मत करके कमला के पास आई और उसके कंधे पर हाथ रख उसे सांत्वना देने का प्रयास करने लगी. सांत्वना पा कमला उससे लिपटकर जोर-जोर से रो पड़ी. पूछने पर बताया कि उसने अपनी बेटी की हत्या की है. इतना सुनते ही बैरक की अन्य बंदियों के चेहरे पर आश्चर्यमिश्रित भाव उभर आये. क्या, अपने ही हाथों अपने जाया की हत्या? कितनी निष्ठुर है तू, सहसा एक बंदी बोल पड़ी. पर न जाने क्यों, कुमुदनी को कमला की बातें अविश्वसनीय सी लगीं. उसने हठात उससे पूछ लिया -
'किसे बचाने के लिए स्वयं को हत्यारिन सिद्ध कर रही है?'
कमला ने कुमुदनी के प्रश्न का उत्तर दिए बिना अपनी गर्दन नीचे झुका ली.
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आज अदालत में कमला की पेशी थी. कठघरे में खड़ी कमला से वकील ने पूछा-
'तुमने अपनी बेटी की हत्या क्यों की?'
कमला ने लगभग चीखते हुए कहा- 'हत्या नही की है, मुक्त किया है उसे.'
वकील ने फिर पूछा- 'अपाहिज थी इसलिए हत्या की ना तुमने उसकी?'
कमला - 'अपाहिज थी इसलिए मुक्त किया उसे.'
वकील लगभग चिल्लाते हुए बोला- 'ये क्या मुक्त-मुक्त लगा रखा है, सीधे स्वीकार क्यों नहीं कर लेती की अपाहिज थी इसलिए अपनी बेटी की हत्या की तुमने?'
वकील की बातें सुन कमला चीख पड़ी और बोली, अपने प्राणों से अधिक प्रिय थी वह मुझे. अपाहिज थी तो क्या हुआ. मेरी पहली संतान थी. मां बनने का गौरव दिया था उसने मुझे. कब तक बचाती रहती उसे पुरुष नामक भेड़िए से. फिर न्यायाधीश की ओर देखकर कहने लगी -
'साब हम गरीब लोग हैं. मैं कोठी में काम करती हूं और मेरे पति भी काम के सिलसिले में बाहर रहते हैं. मेरे घर आने तक मेरी बच्ची अकेले रहती है. उस दिन जब मैंने सुना कि मेरी ही बस्ती की एक चार बरस की बच्ची को अगवा कर पांच लोगों ने उसके साथ दरिंदगी की, तो मेरा मन कांप उठा. मेरी बच्ची तो अपाहिज थी, वह बोल-सुन भी सकती थी. ऐसे में मेरी बच्ची के साथ भी तो........
फफक पड़ी थी कमला.
'बस, इसीलिए उस दिन मैंने अपनी ममता को कुचल  अपनी बच्ची को कुचलने से बचा लिया. साब, अब बच्चियों में भगवान नहीं दिखते लोगों को, केवल उनके अंग दिखते हैं. अब आप जाे चाहे मुझे दंड दें, मुझे स्वीकार होगा. एक निवेदन है, मेरे दूधमुुंहे बच्चे को मेरे पास रहने की आज्ञा दे दीजिए.'
कमला की बातों ने अदालत में सबको सन्न करके रख दिया था. न्यायाधीश महोदय ने अपना निर्णय सुनाते हुए कहा - 'कमला यह सच है कि हमारे समाज में बच्चियों के साथ क्रूरता बढ़ती जा रही है, लेकिन इसका अर्थ यह तो नहीं कि हम उनसे जीने का अधिकार छीन लें. तुमने हत्या की है और इसके लिए तुम्हें आजीवन कारावास का दंड दिया जाता है. एक बात और, चूंकि तुम्हारा बच्चा छोटा है इसलिए उसे तुम्हारे पास रहने की आज्ञा दी जाती है.'
अदालत के निर्णय के बाद कमला के चेहरे पर दु:ख के बावजूद हल्की मुस्कान तैर गई. इस मुस्कान का अर्थ बेटे का साथ मिलने की खुशी थी या बेटी को मुक्त करने की सजा पाने की, कौन जाने.
- तरु श्रीवास्तव


बुधवार, 11 जुलाई 2018

कविता

जाननेवाला
तुम्हें मेरे गालों,
मेरे बालों की चमक दिखाई देती है
चेहरे पर मासूमियत, उम्र पर विजय पा चुकी त्वचा,
कमनीय देहयष्टि दिखाई देती है
पर, आंखों की उदासी, अनकहे शब्द
जिसे मैं चाहती हूं तुम पढ़ लो
बिना कहे,
एक बार भी दिखाई नहीं देती,
कैसे मनाऊं मन को
कोई है, मुझे जाननेवाला भी.



- तरु श्रीवास्तव