गजल
दम निकलने वाला था आप आ गए
घड़ी भर को जिंदगी हम पा गए।
जुस्तजू आपकी कब से रही
आप आए नहीं हम मुरझा गए।
खिली-खिली सी चांदनी क्या करेंगे हम
कोई साथी नहीं हम तन्हा रह गए।
फितरत ना जानते थे घर में पनाह दी
अपने ही घर में हम बेगाने रह गए।
दर्द इतना जमाने से हमको मिला
मोम से धीरे-धीरे शीला बन गए।
हम भटकते रहे बस इधर से उधर
घर बसा ना सके, आप जब से गए।
दम निकलने वाला था आप आ गए
घड़ी भर को जिंदगी हम पा गए।
- तरु श्रीवास्तव
दम निकलने वाला था आप आ गए
घड़ी भर को जिंदगी हम पा गए।
जुस्तजू आपकी कब से रही
आप आए नहीं हम मुरझा गए।
खिली-खिली सी चांदनी क्या करेंगे हम
कोई साथी नहीं हम तन्हा रह गए।
फितरत ना जानते थे घर में पनाह दी
अपने ही घर में हम बेगाने रह गए।
दर्द इतना जमाने से हमको मिला
मोम से धीरे-धीरे शीला बन गए।
हम भटकते रहे बस इधर से उधर
घर बसा ना सके, आप जब से गए।
दम निकलने वाला था आप आ गए
घड़ी भर को जिंदगी हम पा गए।
- तरु श्रीवास्तव
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