शनिवार, 14 अक्टूबर 2017



जिस रोज से आये हो

दिन कैसे गुजरता था, तन्हा, गुमसुम रह के
हर पल दिल गाने लगा, जिस रोज से आये हो।

बेमकसद कितने थे, आवारा बादल से
ठहराव सा आया है, जिस रोज से आये हो।

ख्वाबों के बगीचे में, अल्हड़ सी विरानी थी
सतरंगी सपने सजे, जिस रोज से आये हो।

वही तपती दोपहरी थी, वही बेरंग आठों पहर
रिमझिम सावन बरसा, जिस रोज से आये हो।

हर मौसम जलते थे, फागुन हो या सावन हो
हैं जेठ में भीगे हुए, जिस रोज से आये हो।

तारे अनगिन थे यहां, कोई चांद ना दिखता था
हर रात पूनम सी हुई, जिस रोज से आये हो।

थे भीड़ में भी तन्हा, सब लगते बेगाने थे
तुम अपने से लगने लगे, जिस रोज से आये हो।

ना पढ़ना आता था, ना लिखना आता था
नवगीत लगे रचने, जिस रोज से आये हो।
- तरु श्रीवास्तव

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