इसे प्रेम कहते हैं
शायद,
इसे ही प्रेम कहते हैं
तुम संग
हर रात मधुमास सी होती है
चांदनी की शीतल-धवल किरणें
मेरे कलेजे पर
लोट-लोट जाती हैं सांप सी
तुम बिन
शायद,
इसे भी प्रेम कहते हैं।
- तरु श्रीवास्तव
शायद,
इसे ही प्रेम कहते हैं
तुम संग
हर रात मधुमास सी होती है
चांदनी की शीतल-धवल किरणें
मेरे कलेजे पर
लोट-लोट जाती हैं सांप सी
तुम बिन
शायद,
इसे भी प्रेम कहते हैं।
- तरु श्रीवास्तव
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