शुक्रवार, 22 दिसंबर 2017

बटवृक्ष
घनी आबादी सा होता प्रतीत
एक बटवृक्ष,
जिसकी छाया तले
अनगिनत, अनजाने राहगीरों ने
बिताये होंगे केवल अपने कुछ पल
असंख्य पौधे मुरझाये होंगे
खोकर अपने अस्तित्व को
कितनी अट्ठासें ली होंगी इसने
देखकर अपने विशाल शरीर को
इसकी शाखा से
अनेक द्वितीयक जड़ें निकलकर
समाई होंगी धरती में
करने को सुरक्षित अपना भविष्य
एक बटवृक्ष।
इसकी मीलों तक फैली जड़ें
दूर-दूर तक फैली शाखायें
आभास देती होंगी हरियाली का
काल के सम्मुख नतमस्तक
आज बनकर खड़ा है
केवल एक ठूंठ
अपनी समृद्धि को इतिहास में समेटे हुए
जगत के समक्ष
एक बटवृक्ष।
- तरु श्रीवास्तव

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